Pages

Monday, March 7, 2022

आनंद की प्रतीक्षा में

संकेत है माना मैं "पृथ्वी" हूँ

व्रह्माण्ड में नक्षत्रों राशियों ग्रहों द्वारा दृस्ट सापेक्ष स्थित

एक ही समय में उजाले अँधेरे से आच्छादित

एक ही समय में वर्षा धुप सूखा बाढ़ आदि

विभिन्न स्वरुप सागर नदी पहाड़ मरुस्थल आदि

ठीक वैसे ही सगे-सम्वन्धियों-अपनों-परायों के बिच

अलग अलग रूप लिए एक ही समय में जीता हूँ

मेरा "सत्य" विविध मेरे लिए भी

और औरो के लिए भी पहेली है

संतुलन साध न पाया

अपना सत्य मुँह से निकाल न पाया

पाप बोध आत्म ग्लानि प्राश्चित की अग्नि से शुद्ध

जब अन्तःह्रदय शुद्ध पवित्र होगा

तब संभवतः रक्त-माँस निर्मित अशुद्ध देह

शुद्ध हो सत्य धारण के योग्य होगा

आनंद की प्रतीक्षा में

मैं "पृथ्वी" सदृश्य अंतरिक्ष में लटकता हुआ

अनंत की यात्रा में



Wednesday, January 13, 2021

मैं मेरा स्वप्न और यथार्थ

बिखरे हुए सपने

रेत सा फिसल जाते है

मुट्ठी में कुछ भी रह नहीं जाता

असफल प्रयास बार-बार

थका देता है

भीतर एक डर

लहर बन दौड़ता है

सोचने को मजबूर

आँखे बंद किये

बैठ जाता हूँ

एक शोर धक-धक सा

समँदर के लहरों सा

सांसो से कुछ गरमी

उबलते रक्त के सिथिल होने सा

हवा का स्पर्श

कुछ कहता है मानो

समय नहीं थमने बाला

बह जाओ

छोड़ दो जिद्द

जी लो जो है जी भर के

मत रोको मत पकड़ो

संग हो लो

देखते हुए

सपने को सत्य समझ के

सत्य को सपने समझ के

तुम हो उसी में

वह है तुम्ही में

फिर कैसी कशमकश

रेत मुट्ठी में

या तुम रेत पे

या रेत में

तुम सपने में

या सपने तुममें

तुम उसके नियंत्रण में

या वो तुम्हारे नियंत्रण में

चक्र ही तो है बस

जो तुमने

सुगंध को रोकने की कोसिस की

और वो समां गया तुममे

कहाँ अलग हो पाए

अब तुम सुगंध हो

या सुगंध तुम

शब्दों से तो कुछ कह नहीं पाओगे

तो क्या तुमने कुछ जिया नहीं

कुछ महशुश नहीं किया

तुम्हारे भीतर के अनंत में

या तुम्हारे बाहर के अनंत में

कहाँ अनंत ढूंढोगे

जो है वही अनंत का हिस्सा है

कल आज और कल तुमसे है

तुम नहीं ये छण  नहीं

फिर कैसी असफलता और कैसी सफलता

क्या पकड़ना और क्या छोड़ना

तुम ही समय हो

तुम ही अनंत

तुम ही स्वप्न हो

तुम ही सृजन हो

तुम ही प्रलय हो

तुम ही सत्य हो

और तुम ही हो माया

फिर स्वयं ही स्वयं को कैसे पकड़ोगे

बिखरा हुआ तुम्हारा स्वरुप

कैसे स्वयं समेटोगे

स्वयं से अलग स्वयं को कैसे देख पाओगे

अब हंस भी दो कुछ बोल भी दो

मौन ही मौन

कुछ मौन

तुम्हारे मुट्ठी में

भीतर या बाहर

तुम हो कौन

हाँ सचमुच

मैं हूँ मेरा मौन है

मेरे शब्द है मेरा ब्रह्माण्ड है

हाँ मैं ही मेरा स्वप्न हूँ

और मैं ही मेरा यथार्थ

कुछ शेष नहीं

सब कुछ है मेरे पास

क्योंकि मैं ही तो हूँ सब में सब कुछ में

स्वेत प्रेम पत्र

हे प्रिये हे सखी

मैंने लिखा है प्रेम पत्र

इन बिन लिखे खाली पन्नों में

पढ़ लेना

मेरे मनोभाव को

अपने सुन्दर स्वप्नों से

कल्पना के जीवंत रंगो से

प्रेम कहानी सजा लेना

मेरी अनकही गीत

स्वयं ही  गुनगुना लेना

मीठी सी गुदगुदी सी

कोमल स्पर्श भांप लेना

क्योंकि शब्दों की सीमाओ से

तुम कहीं आहात न हो जाओ

इसीलिए मैंने ये पत्र

यूँ ही कोरा छोड़ा है

मौन ही मौन को पढ़ सकता

ऐसा मेरा भरोसा है

मै और तुम दो नहीं

ऐसा मेरा समझना है

कहीं पर तुम और

कहीं पर मैं

पर

ह्रदय वही राग रचता है

जिस पर मन तुम्हारा थिरकता है

इक्षाओं से बिषाक्त शरीर-मन

प्रेम समर्पण क्या जाने

इसीलिए मैंने ये पत्र

स्वेत-स्वेत ही छोड़ा है

भर लो अपने रंग तरंग

अपने ही भाव से गा लेना

ना  हो प्रेम अगर मुझसे तो

उत्तर कुछ भी लिख देना

शब्दों से शोर से नहीं अपरिचित

अर्थ  समझ ही जाऊंगा

भाव अगर तुम तक पहुँचा हो

मौन ही मौन रह जाना

शब्दों की स्वीकृति नहीं

मन में ही मुस्का लेना

ह्रदय के तार ऐसे जुड़े है

नेत्र इसे पढ़ ही लेगा

इसीलिए तो स्वेत प्रेम पत्र में

मैंने स्वयं को भेजा है

पूर्ण समर्पित निर्मल ह्रदय पर

अब तुमको ही तो धड़कना  है

क्यों ना खो जाऊ अँधेरे में

क्योँ  जाऊँ उजाले की ओर ,

जबकि मैं जानता हूँ

हर छण संघर्ष है अँधेरे से

अनगिनत कष्ट विघ्न बाधाएं

बिना विश्राम लड़ते रहना है ,

और फिर उजाला पा भी लिया ,

या कुछ ऊपर पहुँच ही गया ,

तो क्या होगा ,

तब तक शरीर साथ छोड़ देगा,

इतिहास के पन्ने में

अंकित होने मिटने के सिबा मेरा क्या उपयोग

और कुछ लोग मेरी निर्मलता-साधना को उत्पाद बना

ठगेंगे उन गरीब निरीह  भाभुक लोगों को

जिन्हे उजाले से सदैब उम्मीद रहती है

क्या मैं किसी को छलने का माध्यम बनूँगा

किसी के प्रपंच का अस्त्र होऊ

जिससे सदैब मानवता आहत होती रही है

इससे तो अच्छा है

ना लड़ूँ ना संघर्ष करू

अँधेरे को अपना लूँ

कोई नश्वर निशान क्यों छोड़ जाना

जिसका उपयोग मैं नियंत्रित ही नहीं कर सकता

और अँधेरे में बुराई ही क्या है

सृष्टि का हिस्सा है

स्थिर वर्तुल कुछ होता नहीं

परिवर्तनशील है सब कुछ

अँधेरा उजाला चक्र तो नियति है

तो क्यों ना खो जाऊ अँधेरे में …..


Tuesday, December 22, 2020

प्रेम

भव चक्र महासमर में,

जब कृष्ण मौन खड़े थे,

ह्रदय में प्रेम की जोत लिए

राधा असहाय खड़ी थी,

विनास को अग्र्सर नियति,

असत्य आच्छादित होने को था,

रात बड़ी गहरी थी,

पर समय नहीं ठहरा था,

क्षण- क्षण आगे को उन्मुख,

समय करवट को आतुर था,

भक्ति निर्मल कर्म धैर्य से,

शुभ प्रेम की शक्ति प्रवल थी,

अशुभ कर्म का तप हुआ निष्तेज,

जब तेज शक्ति का फूटा था,

प्रेम ही शक्ति का श्रोत,

जग ने तब यह जाना था,

महाप्रलय और सृजन चक्र में,

यह सब तो होना ही था,