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Tuesday, May 1, 2018

मौन

मौन से, 
जन्मते ही रोना,
और
धीरे धीरे,
दुनिया देख,
सीखना,
हँसना,
झूठ को सच करने का प्रयास,
और
सच को झूठ  
और,
अंततः,
हँसने-रोने से मुक्त,
सच और  झूठ  से परे,
मौन,
क्या है ये ?
क्या यही वो माया है ?
भ्रम है,
जो शरीर धारण करते ही,
शुरू होता है,
और,
क्रमशः,
समझ आता है,
कि जो कहा जा सकता है,
वो सच नहीं,
और,
जो सच है,
वो कहा नहीं जा सकता

Saturday, December 30, 2017

मैं मैं नहीं

चल सकोगे मेरे साथ,
क्यूँकि,
 मैं चलता नहीं,
चलते हुए प्रतीत होता हूँ,
तुम्हारा प्रयास,
तुम्हे रोकता है,
मेरे से दुर करता है,
क्यूँकि,
मैं तो लहरों पे सबार हूँ,
समय की ज्वार पे बैठा,
साक्षी भाव से मुस्कुराता,
तुम्हे देखता हूँ,
तुम्हारे डर को देखता हूँ,
पर मैं कुछ कर नहीं सकता,
क्यूँकि,
मैं इस रोमांच को साझा नहीं कर सकता,
खोया हूँ,
लीन हूँ,
प्रकृति में बिलिन हूँ,
क्यूँकि,
मैं मैं नहीं,
जिसे तुम जानते हो,
मैं तो कोई और हूँ,
जिसकी कोई स्मृति नहीं,

Sunday, September 24, 2017

बिखरते हुए रहना ही काफी होगा

मेरी रचनाये बिखर गयी,
ढ़ेर में कहीं खो गयी,
यादों को समेटने की चाह,
समय की नदी में बह गयी,
अब क्या करूँ ?
बहाव में बह जाऊँ,
या फिर पीछे से,
पन्ने  कूड़े से ले आऊँ,
नहीं नहीं !
जो छूट गया सो छूट गया,
आने  बाला भी  छूटेगा,
क्या करूँगा ?
उन पदचिन्हो का,
जो बंचित करेंगे,
भ्रमित करेंगे,
कतारों में होने को बाध्य करेंगे,
अनजान के रोमांच,
आनंद की मिठास,
मैं नहीं छीनना चाहता,
कुछ देने के भ्रम में,
झूठा उजाला फैलाना नहीं चाहता,
मेरी तो चाह है,
भटको,
स्वयंग को जानो,
बहो बहो बहते जाओ,
अनजाने अंधियारों को चिर,
प्रकाश पुंज में समां जाओ,
फिर समेटने की चाह होगी,
जलते हुए रहना,
बिखरते हुए रहना ही काफी होगा,

सच की खोज में

सच की खोज में,
उम्र बीत गयी,
एक पड़ाव पे,
पता चला,
सच तो मिला नहीं,
झूठ के पहाड़ पे,
चलता रहा अब तक,
पीछे मूड के देखा,
कुछ नहीं था,
एक अनुभव,
जो सच है,
अभी है,
जो एक बुलबुला है,
फुट जाता है,
परिस्थिति के बदलते ही,
बदल जाता है,
शब्दों की पहेली में उलझा,
एक शव्द है,
जो अब भी अर्थ ढूंढ़ रहा है,

प्रयास तो झूठ को सच करने में है

कमजोर और विवस
होना अच्छा है,
घुटने टेकना अच्छा है,
बुराई की पहली ही सीढी से,
उतर जाना अच्छा है,
खुद पे अधिक विश्वाश,
करना अच्छा है,
आगे नहीं बढ़ना,
भयभीत होना अच्छा है,
पर !
छिपना छिपाना,
झूठ के सहारे चलना,
अच्छा नहीं,
मार्ग कहाँ ले जाये,
और कब भटका दे,
इसीलिए,
बिना प्रयास,
सिर्फ सच पे चलना,
अच्छा है,
क्यूंकि,
प्रयास तो झूठ को सच करने  में है,

Tuesday, August 1, 2017

अनंत से अनंत की और

या तो झुकोगे,
या प्रकृति झुकायेगा,
स्वयं झुकोगे,
तत क्षण आनंदित होओगे,
प्रकृति झुकायेगा,
तब तक बंचित रह जाओगे,
पर तब भी आनंद ही है,
क्यूंकि मूल्य जो चुकाया है,
प्रकृति लौटाएगा ही,
क्यूंकि जन्म जन्मांतर से,
तुम उसी आनंद की और हो,
कस्ट बेदना से होते हुए,
अनंत से अनंत की और,
अनंत में लीन बिलिन होजाओगे,